बिहार के साथ ही ओडिसा और आंध्रप्रदेश में भी है श्राद्ध का महत्व, इन्हें कहा जाता है त्रिगया तीर्थ

श्राद्ध पक्ष के दौरान बिहार के गया तीर्थ पर पितरों का श्राद्ध करने से कई लोग आते हैं। इसलिए इसे पितृ तीर्थ भी कहा जाता है। इस जगह के बारे में विष्णु पुराण में भी बताया गया है। इस पुराण के अनुसार गयासुर नाम के राक्षस ने यज्ञ के लिए भगवान विष्णु को अपना शरीर दिया था। जिस पर यज्ञ किया गया था। आज उसके शरीर पर त्रिगया तीर्थ है। यानी तीन पितृ तीर्थ है। जहां पितरों की संतुष्टि के लिए श्राद्ध किए जाते हैं।
परंपरा के अनुसार गयासुर के शरीर के मुंह वाले हिस्से पर बिहार का गया तीर्थ है। जिसे शिरो गया नाभि वाला हिस्सा ओडिशा के जाजपुर में है। वहां भी पितरों के लिए श्राद्ध किया जाता है और पैर वाला हिस्से पर आंध्रप्रदेश का राजामुंदरी शहर है। वहीं पीठापुरम तीर्थ है। जिसे पद गया कहा जाता है।

  • बिहार के डॉ. अरविंद महाजन के मुताबिक साहित्य में गयासुर की समृद्ध परंपरा है। ओडिसा के जाजपुर व राजामुंदरी के पीठापुरम में भी गया की तरह पिंडदान की परंपरा है। लेकिन गया की मान्यता ज्यादा विकसित हुई। गयासुर की परंपरा विष्णु पुराण में आई है, जो छठी सदी की है। गया महात्म्य बाद की लगभग 10वीं सदी की रचना है।
  • इंग्लेंड के प्रोफेसर एन्ड्रयू स्टर्लिंग ने अपनी किताब में गयासुर के बारे में लिखा है कि गयासुर का आकार इतना बड़ा था कि सिर गया, नाभि जाजपुर व पैर आंध्रप्रदेश के राजामुंदरी तक फैला था। जाजपुर मंदिर में एक पवित्र कुंआ है, जिसे गया नाभि या बंभी कहते हैं। यहां हिंदुओं द्वारा अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए पवित्र पिंड अर्पित की जाती है।

बिहार के गया के अलावा अन्य 2 गया तीर्थ

नाभि गया, याजपुर ओड़िशा
जाजपुर ओड़िशा के तीन प्रसिद्ध स्थानों में से एक है। जाजपुर नाभि गया क्षेत्र माना जाता है। श्राद्ध तर्पण ही यहां का मुख्य कर्म है। कहा जाता है कि जब ब्रह्माजी के कहने पर गयासुर ने यज्ञ के लिए अपना शरीर दिया तो इसी जगह उसकी नाभि थी। इसलिए इसे नाभि गया तीर्थ भी कहा जाता है। यहां वैतरणी नदी है। वैतरणी नदी के घाट पर ही मंदिर हैं। इनमें गणेश, सप्तमातृका और भगवान विष्णु के मंदिर हैं। वैतरणी नदी पार करके भगवान वाराह के मंदिर में जाना पड़ता है। ये यहां का प्राचीन मंदिर माना जाता है। घाट से 1 मील पर गरुड़ स्तम्भ है। उसके आगे ब्रह्मकुंड के पास विरजा देवी का मंदिर है। ये 51 शक्तिपीठों में से एक है। माना जाता है देवी सती की नाभि यहीं गिरी थी।

पदगया, पीठापुरम आंध्रप्रदेश
पीठापुरम को मूल रूप से पिष्टपुरा कहा जाता था। इस शहर के बारे में सबसे पहले चौथी शताब्दी यानी राजा समुद्रगुप्त के काल का मिलता है। जिसमें कहा गया है कि उसने पिश्तपुरा के राजा महेंद्र को हराया था। चौथी और पांचवीं शताब्दी के शिलालेखों में वशिष्ठ और मथारा राजवंशों ने भी कलिंग के एक हिस्से के रुप में बताते हुए पिष्टपुरा के बारे में लिखा है। 7 वीं शताब्दी में चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय ने पिष्टपुरा को अपने राज्य में मिला लिया।
ग्रंथों में पिठापुरम त्रिगया क्षत्रों में से एक है और पद गया क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध हो गया है। ये क्षेत्र पवित्र दानव गयासुर के कारण बना है। उस राक्षस ने लोगों की भलाई के लिए एक महान यज्ञ करने के लिए ब्रह्मा जी के कहने पर अपना शरीर दिया था। यह भारत के सबसे पुराने और प्रसिद्ध तीर्थ शहरों में से एक है। ये तीर्थ 18 शक्तिपीठों में से एक है। यह शहर कुक्कुटेश्वर स्वामी मंदिर, कुंती माधव स्वामी मंदिर, श्रीपद श्रीवल्लभ महास्नानम पीठम के लिए भी प्रसिद्ध है।



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Along with Bihar, Odisha and Andhra Pradesh also have importance of Shraddha, they are called Trigaya Tirtha


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बिहार के साथ ही ओडिसा और आंध्रप्रदेश में भी है श्राद्ध का महत्व, इन्हें कहा जाता है त्रिगया तीर्थ बिहार के साथ ही ओडिसा और आंध्रप्रदेश में भी है श्राद्ध का महत्व, इन्हें कहा जाता है त्रिगया तीर्थ Reviewed by Prbnews on September 10, 2020 Rating: 5

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