प्रसाद बनाने के सख्त नियम- भोग बनाने वाले आपस में बात नहीं करते, हाथों में अंगूठी भी नहीं पहनते

18 नवंबर को छठ पूजा का पहला पर्व नहाय-खाय था। आज 19 तारीख को खरना है। खरना के दिन छठी माता की पूजा के लिए खरीदारी और तैयारी की जाती है। इस दिन व्रत करने वाले लोग शाम को शांतिपूर्ण वातावरण में पूजा करते हैं। छठ पूजा के लिए भोग बनाने के लिए कई सख्त नियमों का पालन किया जाता है। भोग बनाने वाले लोगों को नए कपड़े पहनने होते हैं, लेकिन हाथों में अंगूठी नहीं पहनते हैं।

छठ पूजा के दूसरे दिन खरना पूजा की परंपरा है। नहाय खाय के दिन छठ पूजा का सामान खरीद सके तो ठीक, वरना खरना के दिन खरीदारी की जाती है। नहाय खाय के बाद से व्रती को खरना की शाम में ही भोजन ग्रहण करना होता है। इसके बाद करीब 36 घंटों का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।

छठ पूजा के लिए भोग बनाने के हैं सख्त नियम

खरना में कहीं-कहीं बिना शकर की दूध की खीर बनाई जाती है तो कहीं-कहीं गुड़ की खीर के साथ पूड़ी का भोग लगाने की परंपरा है। कहीं-कहीं मीठा चावल भी चढ़ाते हैं। यह केले के पत्ते पर रखकर चढ़ाए जाते हैं। पूड़ी-खीर के साथ ज्यादातर क्षेत्रों में इस पर पका केला ही चढ़ाया जाता है।

खरना पूजा की तैयारी भी खास तरीके से की जाती है। यह प्रसाद तैयार हो जाए तो आसपास के इलाकों में समय तय कर लिया जाता है। करीब 15 मिनट के आसपास का समय तय होता है और इस दौरान किसी भी तरह की आवाज नहीं की जाती है। बच्चों को भी रोने नहीं दिया जाता है।

व्रती को पूजा घर में भोजन ग्रहण करना होता है। भोजन ग्रहण करते समय कोई आवाज आ जाए तो व्रती के हाथ वहीं रुक जाते हैं। व्रती का छोड़ा हुआ भोजन भी प्रसाद स्वरूप माना जाता है।

इस प्रसाद को ग्रहण करने से पहले छठी माई का आशीर्वाद लिया जाता है और पूजा में चढ़ा प्रसाद लेकर निकलते समय व्रती से छोटे सभी लोग उनके पैर छूते हैं। उनका छोड़ा भोजन प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। आमतौर पर घर के सदस्य ये खाना जरूर खाते हैं।

भोजन के बाद थाली ऐसी जगह धोते हैं, जहां पानी पर किसी का पैर न लगे और इसका धोवन अन्य जूठन में न जाए।

20 नवंबर की शाम डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इस दिन सुबह से ही नियमों में और ज्यादा सख्ती हो जाती है। शाम में अस्ताचलगामी यानी अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

शाम के अर्घ्य के कारण इसे ठेठ मैथिल में संझका अरग भी कहते हैं। प्रसाद बनाने में इस्तेमाल होने वाली चीजें सात्विक होनी चाहिए। प्रसाद बनाने में घर के जो लोग लगेंगे, वह नहाय-खाय के दिन नाखून वगैरह काट चुके होते हैं। नहीं काटे हों तो प्रसाद बनाने के लिए पूजाघर में घुसने के पहले नाखून काटकर सफाई कर लेनी होती है।

पूजाघर के लिए अलग कपड़ा रखना होता है। प्रसाद बनाने के लिए घुसने वाले लोग निकलने के बाद ही खाना खा सकते हैं। प्रसाद बनाने का सारा इंतजाम करने के बाद ही अंदर आना अनिवार्य होता है या फिर बाहर का काम करने के लिए इसी तरह साफ-सुथरा होकर किसी को रहना पड़ता है।

बहुत सावधानी और साफ-सफाई का ध्यान रखकर बनाते हैं भोग

भोग बनाते समय कम बोलना होता है और बोलें भी तो दूसरी तरफ घूमकर ताकि प्रसाद में मुंह का गंदा न गिरे। प्रसाद बनाने वाले लोग अंगूठी पहनकर नहीं जाते, क्योंकि उसके अंदर भी प्रसाद का हिस्सा फंसकर बाहर जूठन तक पहुंच सकता है या नीचे गिर सकता है।

अंदर का काम पूरा करने के बाद हाथ वहीं बाल्टी में धो लिया जाता है और वहां के कपड़े भी वहीं छोड़ दिए जाते हैं ताकि प्रसाद का हिस्सा बाहर नहीं आ जाए।

यह सब दोपहर तक पूरा करना होता है। इसके बाद सूप-दउरा सजाकर छठ घाट की ओर निकल जाते हैं। छठ घाट पर सूर्यास्त से कुछ देर पहले व्रती को पानी में उतरना होता है और सूर्यास्त के पहले हर सूप पर चढ़े प्रसाद को सूर्यदेव के सामने रखकर अर्घ्य अर्पण किया जाता है।

भोर का अरग के लिए रात 3 बजे उठकर निकल जाते हैं लोग

शाम का अर्घ्य अर्पण करने के बाद सूप के प्रसाद को उतारकर एक तरफ रख लिया जाता है और फिर सुबह के अर्घ्य के लिए उसी सूप को साफ कर तैयार कर लिया जाता है। उसमें नया प्रसाद डालकर रखा जाता है और घाट पर सूर्योदय के समय से एक घंटे पहले पहुंचकर उसे सजा लिया जाता है। इसे भोर का अरग कहते हैं। इस बार ये 21 तारीख को है।

सूर्योदय से जितना पहले व्रती पानी में उतर कर छठी मइया की आराधना कर सकें, उतना अच्छा। घाट पर पूजा करने के बाद व्रती के जलस्रोत से निकलते ही लोग उनके पैर छूते हैं। उनके कपड़ों को धोकर आशीर्वाद लेते हैं। व्रती कोई भी हो, उससे प्रसाद लेकर ग्रहण किया जाता है।



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प्रसाद बनाने के सख्त नियम- भोग बनाने वाले आपस में बात नहीं करते, हाथों में अंगूठी भी नहीं पहनते प्रसाद बनाने के सख्त नियम- भोग बनाने वाले आपस में बात नहीं करते, हाथों में अंगूठी भी नहीं पहनते Reviewed by Prbnews on November 18, 2020 Rating: 5

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